
वाराणसी। देश के केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों में शोधरत छात्रों को दी जाने वाली NON-NET Fellowship की धनराशि में वृद्धि की मांग तेज हो गई है। वर्तमान में अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालयों में यह राशि मात्र 8,000 रुपये प्रतिमाह है, जिसे शोधार्थियों ने अपर्याप्त और अन्यायपूर्ण बताया है।
शोध छात्रों का कहना है कि यह राशि वर्ष 2008 में तत्कालीन आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार तय की गई थी। उस समय JRF Fellowship की राशि 16,500 रुपये प्रतिमाह थी, जो NON-NET Fellowship से लगभग दोगुनी थी।
वर्तमान समय में JRF की धनराशि बढ़कर मकान किराया भत्ता (HRA) सहित लगभग 45,000 रुपये प्रतिमाह तक पहुंच चुकी है, जबकि NON-NET Fellowship में पिछले दो दशकों से कोई वृद्धि नहीं की गई।
शोधार्थियों का कहना है कि इतनी कम धनराशि में पूर्णकालिक शोध कार्य करना बेहद कठिन हो गया है। इससे न केवल शोध गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, बल्कि शोध छात्रों को मानसिक एवं आर्थिक दबावों का भी सामना करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर उच्च शिक्षा में शोध की गुणवत्ता पर पड़ता है।
इस संबंध में शोध छात्रों द्वारा एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसे शीघ्र ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को भेजा जाएगा।
शिवम सोनकर ने बताया कि शोधार्थियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि आयोग इस मांग पर गंभीरता से विचार करेगा।
शोध छात्रों की प्रमुख मांगें
वर्तमान में 8,000 रुपये प्रतिमाह दी जा रही NON-NET Fellowship को बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रतिमाह किया जाए।
Fellowship को महंगाई सूचकांक से जोड़ा जाए ताकि समय-समय पर इसमें स्वतः वृद्धि हो सके।
देश के सभी केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों में प्रत्येक शोधार्थी को NON-NET Fellowship से जोड़ा जाए।
शोध छात्रों का कहना है कि देश की उन्नति एवं उच्च शिक्षा का भविष्य गुणवत्तापरक शोध कार्यों से जुड़ा है, ऐसे में शोधार्थियों को आर्थिक रूप से मजबूत करना आवश्यक है।
